महर्षि दधीचि का वज्र और परमवीर चक्र
भारतीय सैन्य इतिहास में अदम्य साहस के सर्वोच्च प्रतीक 'परमवीर चक्र' की बनावट के पीछे त्याग और तपस्या की एक ऐसी गाथा छिपी है, जो सीधे वैदिक काल से जुड़ती है। इस पदक का डिजाइन तैयार करते समय सावित्री खानोलकर (पूर्व नाम इव यवोन मैडे डी मारोस) के मन में एक ही आदर्श था, महर्षि दधीचि। महर्षि दधीचि भारतीय संस्कृति के वे स्तंभ हैं, जिनके बिना अधर्म पर धर्म की विजय असंभव थी। जब वृत्रासुर नामक राक्षस के आतंक से देवलोक कांप उठा और उसे हराने का कोई मार्ग शेष न रहा, तब यह ज्ञात हुआ कि केवल महर्षि दधीचि की अस्थियों से बना 'वज्र' ही उस असुर का वध कर सकता है। महर्षि दधीचि ने बिना किसी संकोच के लोक-कल्याण के लिए जीवित अवस्था में अपनी देह का त्याग कर दिया। उनकी रीढ़ की हड्डी से निर्मित उसी 'वज्र' ने देवताओं को अजेय शक्ति प्रदान की।
सावित्री खानोलकर, जो भारतीय पौराणिक कथाओं और वेदांत की गहरी ज्ञाता थीं, और जानती थीं कि एक भारतीय सैनिक का बलिदान महर्षि दधीचि के उसी 'सर्वोच्च बलिदान' के समान है। इसीलिए, जब मेजर जनरल हीरा लाल अटल ने उन्हें वीरता पदकों को डिजाइन करने का उत्तरदायित्व सौंपा, तो उन्होंने 'परमवीर चक्र' के केंद्र में महर्षि दधीचि के त्याग के प्रतीक 'वज्र' को स्थान दिया। उन्होंने इस डिजाइन में इंद्र के 'वज्र' के चारों ओर छत्रपति शिवाजी महाराज की तलवार 'भवानी' को अंकित किया। यह मेल अद्भुत था, एक ओर ऋषि दधीचि का आत्मिक त्याग और दूसरी ओर महान योद्धा शिवाजी का रण-कौशल।
सावित्री खानोलकर का सफर, स्विट्जरलैंड से भारत तक
20 जुलाई 1913 को स्विट्जरलैंड में जन्मीं यवोन की कहानी किसी फिल्म से कम नहीं है। 16 साल की उम्र में उनकी मुलाकात कैडेट विक्रम खानोलकर से हुई। प्रेम और भारतीय संस्कृति के प्रति खिंचाव उन्हें भारत खींच लाया। हिंदू धर्म अपनाकर वह सावित्री खानोलकर बन गईं और भारतीय रीति-रिवाजों को पूरी तरह आत्मसात कर लिया। उनके पति मेजर जनरल विक्रम खानोलकर ने स्वतंत्र भारत की पहली गणतंत्र दिवस परेड की कमान संभाली थी।
एक अद्भुत संयोग
नियति का चक्र देखिए, सावित्री खानोलकर ने जिस परमवीर चक्र को महर्षि दधीचि की प्रेरणा से डिजाइन किया था, उसका पहला प्राप्तकर्ता उनके अपने परिवार से ही निकला। उनकी बेटी कुमुदिनी के देवर, मेजर सोमनाथ शर्मा, 1947 के युद्ध में श्रीनगर हवाई अड्डे की रक्षा करते हुए शहीद हुए और उन्हें मरणोपरांत भारत के पहले 'परमवीर चक्र' से सम्मानित किया गया।
सावित्री खानोलकर ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष रामकृष्ण मठ में आध्यात्मिकता के बीच बिताए। उन्होंने महाराष्ट्र के संतों पर शोध किया और पुस्तकें भी लिखीं। आज जब भी कोई वीर सैनिक अपनी छाती पर परमवीर चक्र धारण करता है, तो वह न केवल अपनी वीरता का प्रदर्शन करता है, बल्कि महर्षि दधीचि के उस प्राचीन और महान त्याग की परंपरा को भी जीवित रखता है।
(स्रोत-विभिन्न समाचारों पर आधारित)

