संपादक की कलम से
जागरूकता से जीवनदान तक

 पिछले दिनों एक समाचार था कि दिल्ली एनसीआर जीवित अंगदान में सबसे आगे है। एक अच्छा संकेत है कि इस विषय में लोगों की समझ कुछ बढ़ी है। अंगों का व्यापार न हो, इसके लिए कानून बनाया कि निकट संबंधी का अंग ही लाभार्थी को प्रत्यारोपित किया जाएगा।

इस तरह की जानकारियां होते हुए भी साधारणतः मनुष्य ऐसी स्थिति आने पर दाएं-बाएं देखने लगता है कि मेरे अतिरिक्त और कौन हो सकता है जिसका अंग मेरे निकटजन को प्रत्यारोपण के लिए मिल जाए। गिनती भर लोगों ने अपने निकट संबंधी के लिए किडनी या लिवर दान किया तो प्रत्यक्ष उदाहरण देखते देखते, मैं भी आवश्यकता पड़ने पर अपने निकटतम प्रियजन को अंग दे सकता हूं ,ऐसी मन: स्थिति बनती चली गई और ऐसी सोच वाले लोगों का दायरा बढ़ता गया और फिर प्रतीक्षा सूची की समयावधि भी घटकर 3 महीने हो गई, ऐसी खबर भी आई एम्स दिल्ली से । लिवर का छोटा सा हिस्सा निकाल कर जरूरतमंद व्यक्ति को लगाया जाता है । दानी और प्राप्तकर्ता दोनों में ही यह विकसित होकर काम करने लगता है। किडनी की स्थिति यह है कि एक किडनी से मनुष्य का काम चल जाता है। ऐसे भी उदाहरण है कि जन्म के समय एक ही किडनी थी और जीवन सुचारु चलता रहा। पिछले कुछ वर्षों में तेजी से किडनी और लीवर के प्रत्यारोपण की आवश्यकता बढ़ रही है। कारण कुछ भी हो, आवश्यकता बढ़ रही है । चिकित्सा की सुविधा बढ़ रही है और बीमारियां बढ़ रही हैं । हालांकि बीमारियों के प्रति जानकारियां भी बढ़ रही हैं । आवश्यकता है स्वस्थ जीवन शैली के प्रति सजग होने की । टीकाकरण समय पर करना और एक निश्चित आयु के बाद समय-समय पर स्वास्थ्य जांच कराना। हम सभी को स्वस्थ रहना बहुत जरूरी है स्वयं के उपयोगी जीवन के लिए भी और अगर मरणोपरांत शरीर का सदुपयोग चाहते हैं तो यह अंग स्वस्थ होंगे तभी किसी के काम आ पाएंगे। आइए प्रयास करते रहें स्वस्थ रहने का और समाज को स्वस्थ बनाने में सहयोगी होने का। सर्वे संतु निरामया:।

शुभाकांक्षी
मंजु प्रभा

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