अंग प्रत्यारोपण में एक उम्मीद
जब मृत्यु के बाद भी सक्रिय हुईं कोशिकाएं
हजारों वर्षों से मनुष्य की समझ में मृत्यु एक पूर्ण विराम रही है। दिल की धड़कन रुकते ही और सांस थमते ही जीवन की कथा समाप्त मान ली जाती थी। शरीर के अंगों के लिए भी वही नियति तय मानी जाती थी। ऑक्सीजन के बिना वे जल्दी ही निष्क्रिय हो जाते हैं। लेकिन आधुनिक विज्ञान अब इस पूर्ण विराम के बाद भी कुछ पंक्तियां पढ़ने की कोशिश कर रहा है।
हाल के वर्षों में अमेरिका की 'येल यूनिवर्सिटी' के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा प्रयोग किया जिसने चिकित्सा जगत का ध्यान अपनी ओर खींचा। इस शोध में मृत सूअर के शरीर में मृत्यु के लगभग एक घंटे बाद एक विशेष तकनीक के माध्यम से द्रव प्रवाहित किया गया, जिससे कई अंगों में कोशिकीय गतिविधि आंशिक रूप से फिर सक्रिय होती दिखाई दी। यह शोध प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिका 'नेचर' में प्रकाशित हुआ था।
इस प्रयोग में वैज्ञानिकों ने 'ऑर्गनएक्स' नामक तकनीक का उपयोग किया। यह एक उन्नत परफ्यूजन प्रणाली है जिसमें पंप, ऑक्सीजन मिलाने वाला उपकरण और रक्त जैसी विशेष रासायनिक संरचना वाला द्रव शामिल होता है। यह द्रव शरीर की कोशिकाओं तक ऑक्सीजन और पोषक तत्व पहुंचाने के साथ साथ सूजन और कोशिकाओं के तेजी से नष्ट होने की प्रक्रिया को धीमा करने में मदद करता है।
प्रयोग के दौरान पाया गया कि जिन अंगों की कोशिकाएं मृत्यु के बाद क्षतिग्रस्त होने लगी थीं, उनमें कुछ स्तर पर गतिविधि लौटने लगी। हृदय की मांसपेशियों में हल्की विद्युत गतिविधि और संकुचन दिखाई दिए, जबकि लीवर, किडनी और अन्य अंगों की कोशिकाओं में भी जैविक क्रियाएं आंशिक रूप से सक्रिय हुईं। हालांकि वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि मस्तिष्क में चेतना या जीवन की वापसी जैसी कोई प्रक्रिया नहीं हुई—यह केवल कोशिकाओं और ऊतकों के स्तर की गतिविधि थी।
इस खोज का सबसे महत्वपूर्ण संकेत अंग प्रत्यारोपण के क्षेत्र में दिखाई देता है। वर्तमान में प्रत्यारोपण की सबसे बड़ी चुनौती समय है। मृत्यु के बाद ऑक्सीजन की कमी से अंग बहुत जल्दी खराब होने लगते हैं, जिसके कारण अनेक रोगियों को समय पर उपयुक्त अंग नहीं मिल पाता। यदि 'ऑर्गनएक्स' जैसी तकनीक भविष्य में सुरक्षित और प्रभावी सिद्ध होती है, तो अंगों को अधिक समय तक सुरक्षित रखा जा सकेगा और प्रत्यारोपण के लिए उपलब्ध अंगों की संख्या बढ़ सकती है।
इसके अतिरिक्त वैज्ञानिक मानते हैं कि इस तरह की तकनीक भविष्य में हार्ट अटैक, स्ट्रोक या जटिल सर्जरी के दौरान अंगों को होने वाली क्षति को कम करने के नए रास्ते भी खोल सकती हैं।
फिर भी यह खोज केवल वैज्ञानिक उपलब्धि ही नहीं, बल्कि कई नैतिक प्रश्नों को भी जन्म देती है। मृत्यु की परिभाषा क्या है? यदि किसी मृत शरीर की कोशिकाएं फिर सक्रिय हो सकती हैं, तो जीवन और मृत्यु के बीच की सीमा कहां तय की जाए? फिलहाल वैज्ञानिक इस बात पर जोर देते हैं कि यह तकनीक किसी मृत व्यक्ति को पुनर्जीवित करने का तरीका नहीं है, बल्कि केवल जैविक प्रक्रियाओं को समझने और अंगों को सुरक्षित रखने का एक संभावित माध्यम है।
इसलिए 'येल यूनिवर्सिटी' का यह प्रयोग जीवन और मृत्यु की सीमा को मिटा देने का दावा नहीं करता, लेकिन इतना अवश्य दिखाता है कि विज्ञान उस सीमा के आसपास छिपी संभावनाओं को समझने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। संभव है कि आने वाले वर्षों में यही शोध चिकित्सा जगत को ऐसे नए रास्ते दिखाए, जिनसे असंख्य रोगियों के लिए जीवन की उम्मीद कुछ और लंबी हो सके।
(यह आलेख मेडिकल जर्नल में छपे विभिन्न समाचारों पर आधारित हैं।)

