जनहित के लिए जब दधीचि देहदान समिति ने 'वरदान फिल्म फेस्टिवल' के आयोजन की योजना बनाई, तो समिति के अंदर कई लोगों के मन कई तरह के प्रश्न भी उठे। सबसे प्रमुख प्रश्न यह था कि अंगदान और देहदान जैसे अत्यंत गंभीर और संवेदनशील विषयों के लिए एक फिल्म फेस्टिवल का क्या औचित्य हो सकता है?
इस प्रश्न का उत्तर बहुत सीधा और स्पष्ट है। मानवीय संवेदनाएं जब केवल सूचना का रूप लेती हैं, तो वे केवल मस्तिष्क की परतों तक पहुचती हैं और विस्मृत हो जाती हैं, लेकिन जब वही संवेदनाएं कला और सिनेमा का रूप लेती हैं, तो वे सीधे मनुष्य के हृदय को स्पर्श करती हैं। आज के इस आधुनिक डिजिटल युग में 'चलचित्र' यानी सिनेमा अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त और प्रभावशाली माध्यम बन चुका है, जो जनमानस की सोच बदलने की क्षमता रखता है।
दधीचि देहदान समिति के संस्थापक और संरक्षक श्री आलोक कुमार के शब्दों में, यह फेस्टिवल केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह जन जागरण का एक वास्तविक 'वरदान' साबित होगा। जब एक युवा फिल्म मेकर अपने कैमरे के लेंस से अंगदान की महत्ता और उसकी आवश्यकता को करीब से देखता है, तो वह केवल एक फिल्म की रील तैयार नहीं करता, बल्कि वह समाज की सदियों पुरानी रूढ़ियों और जड़ मान्यताओं को तोड़ने वाला एक शक्तिशाली वैचारिक अस्त्र तैयार करता है। सिनेमा की यही शक्ति समाज में परिवर्तन का बीज बोती है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में आज भी अंगदान और देहदान को लेकर कई प्रकार की भ्रांतियां, डर और अज्ञानता व्याप्त है। 'वरदान फिल्म फेस्टिवल' इन मानसिक बाधाओं और संकोच को दूर करने के लिए एक मजबूत सेतु का कार्य करेगा।
शॉर्ट फिल्म, रील, डॉक्युमेंट्री और म्यूजिक वीडियो जैसे समकालीन माध्यमों से नई पीढ़ी इस महादान के संकल्प से जुड़ पाएगी। युवा मस्तिष्क इस बात पर गहराई से विचार कर पाएंगे कि अपनी नश्वर देह के माध्यम से मृत्यु के बाद भी हम कैसे दूसरों के जीवन में जीवित रह सकते हैं। नेत्रदान, अंगदान और देहदान जैसे महान विषयों पर बनी ये फिल्में केवल सूचना का प्रसार नहीं करतीं, बल्कि समाज को यह महान प्रेरणा भी देती हैं कि व्यक्ति को 'स्व' यानी स्वयं के स्वार्थ से ऊपर उठकर 'सर्व' यानी समूची मानवता के कल्याण के बारे में सोचना चाहिए। देहदान और अंगदान को शास्त्रों में वास्तव में 'महादान' की संज्ञा दी गई है।
पौराणिक काल में महर्षि दधीचि ने लोक कल्याण के लिए अपनी अस्थियां दान कर मानवता की रक्षा की थी; आज उसी त्याग की महान परंपरा को आधुनिक वैज्ञानिक स्वरूप में आगे ले जाने की महती आवश्यकता है। यह फेस्टिवल स्थापित और उभरते हुए प्रतिभावान फिल्मकारों के लिए एक ऐसा पवित्र मंच बनेगा, जहां वे अपनी रचनात्मकता और कौशल का उपयोग किसी व्यक्तिगत या व्यावसायिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि अनमोल मानव जीवन बचाने के लिए कर पाएंगे।
'वरदान' फिल्म फेस्टिवल जन समूह को यह संदेश देने में पूर्णतः सक्षम होगा कि मानव शरीर नश्वर है, पर उसके द्वारा किया गया परोपकार सदा के लिए अमर हो जाता है। आइए, हम सब मिलकर इस वैचारिक महाकुंभ का अभिन्न हिस्सा बनें और समाज में व्याप्त अंधविश्वास और अज्ञानता के अंधेरे को ज्ञान, विज्ञान और करुणा के दिव्य प्रकाश से मिटाएं। क्योंकि जब कोई संवेदनशील व्यक्ति देहदान का संकल्प करता है, तो वह केवल एक पार्थिव शरीर पीछे नहीं छोडता, बल्कि वह अनगिनत उदास चेहरों पर मुस्कान और कई टूटते हुए परिवारों को एक नई जिंदगी और उम्मीद दे जाता है। यही इस तरह के आयोजन की सार्थकता है।
शुभाकांक्षी
मंजु प्रभा